Thursday, 6 February 2014

ये एक शहर जो बनारस है. ..!!!!!

मैं हुँ तो पूर्वांचल का और बनारस भी हमारा ही हिस्सा है ! हमारे इलाके लोगों के लिए बनारस बड़ा मायने रखता है, पुराने ज़माने से लेकर आज तक कभी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के नाम पे कभी काशी विश्वनाथ के नाम पे बनारस बड़ा महतवपूर्ण रहा है हम हिन्दुओ के लिए...!!

वैसे मेरा पहली बार बनारस जाना हुआ था २०१० में भारतीय वायु सेना का इंटरवियु देने के लिए पहली बार जब मैं उतरा बनारस जंक्शन पे तो सामने  रिक्शे वालो ने स्वागत किया ! हर कोई पूछ रहा था कँहा चलना है, कँहा छोड़ दे , किसी होटल लॉज कहीं बताइये, एक को लेके जब होटल पहुचे तो एक रात का किराया था १५० रुपये एक बार को लगा कि हम हिंदुस्तान में हीं हैं ना !फिर मेरा एक और दोस्त वहीँ धर्मशाला में रुका था किराया था ३० रुपये मुझे लगा एक हिंदुस्तान में कितने हिंदुस्तान है.खैर जब रत में ४०  रुपये में खाना खाया ( वैसे मैं खाने का शौक़ीन हु ) तो मजा नहीं आया. जंक्शन के पास बने होटल्स एक तो बहुत गंदे होते है दूसरा बहुत महंगे ! ऊपर से खाना भी ताजा नहीं मिलता . लेकिन एक चीझ मिलता है ! लोग प्यार से मिलते है. और अगर आप अच्छे कपड़ो में भोजपुरी में बात करेंगे तो थोडा ज्यादा भाव मिलता है ! और वही रात में जंक्शन के सामने फ्री में मजा लीजिये पूरबी का, चैता का, कजरी का ! वह पे बिना किसी कि जाती या धर्म पूछे शिव मंदिर के सामने लोग भोजपुरी के महान विरासत को सहेजते मिल जायेंगे! कुछ हमारे जैसे लोग अगर जीन्स में भोजपुरी बतियाते चैता गाते  मिलते हैं तो उनका जोश दुगुना हो जाता हैं ! और अगर आप २०-३० रुपये दे देंगे अपने मन से मांगता नहीं हैं कोई तो अच्छा लगता हैं उनको ! वह पे हर तरह के लोग मिलेंगे आपको. मुझे भी पहली बार ताज्जुब हुआ जब बनारस हिन्दू विश्वविदालय के प्रोफेसर को ढोलक बजते देखा चैता गाने पे !   खैर रात के खाने के बाद पाने वो भी बनारस का पान खाने का अपना अलग मजा है. कभी जाइएगा तो खाइएगा जरुर !
बनारस हिंदुस्तान के उन शहरो में से है जंहा हर तरह के लोग मिलेंगे आपको एयरोप्लेन वाले, बड़ी कार वाले छोटी कार वाले ऑटो वाले रिक्से वाले और साइकिल वाले भी ! बाकि शहरो से गायब हो गया टमटम भी दिख जायेगा आपको बनारस में ! और मजे कि बात ऐ है यहाँ हर तबके के लोग ख़ुशी से रहते है ! सड़के टूटी है पर सरकार से शिकायत नहीं है !अपना ठेलठाल के काम चल जाता है ! मुरली मनोहर जोशी एम् पि है पर आते बहुत कम है! लेकिन कोई दिक्कत नहीं भाई राष्ट्रीय लेवल के नेता जो है !
खैर मैं भी क्या लिखने बैठा था क्या लिखने लग गया, हमारा बनारस से कुछ अलग रिश्ता है ! हमे ये शहर अपना जैसा लगता है ! शहर कि खूबसूरती और दिक्कते जो कि नेगेटिव बात कहते है आप लोग वो कभी और ! आज अपनी बात करते है ! हमारे समाज में हम गंगा कि पूजा करते है इसकी पवित्रता के बारे में आप सब जानते है और ये भी जानते है कि इसका महत्व क्या है हम हिन्दुओ के लिए ! तो हमने सोचा कि जो लोग पानी पीते है गंगा का वो कितने पवित्र होंगे, आप हमारी बात सरे बनारसियों पे लागु मत कीजियेगा अपवाद हर जगह मिल जाते है ! तो हमे ऐसे ही एक पवित्र आत्मा से मिलने का मौका लगा और जब मिले तो लगा कि उसको देखा तो गंगा को देखा ! वैसे मैं भावनात्मक इंसान नहीं हुँ लेकिन जब आप किसी से मिलते है तो असर तो होता है तभी तो किसी ने कहा कि कैसे मिल के आम  से मीठी हो गयी धुप ! पता नहीं आज के ज़माने भी ऐसे लोग मिल जाते है जिनकी परिकल्पना नहीं करता है कोई ! सच बात है प्रकृति ने बैलेंस बना रखा है नहीं तो कब का सब बर्बाद हो गया रहता ! मैं अपने आप को खुशनसीब ही मानता हु क्योंकि ऐ सब जो भी हुआ अचानक हुआ लेकिन अच्छा बहुत लगा ! अभी भी जाता हु बनारस मिलता हु गंगा से अच्छा लगता है ! वो पवित्र मिलन सालो भर रहता है  जेहन में और समय के साथ पवित्रता और प्रेम बढ़ता हीं गया हैं गंगा से ! और हमेशा जाने कि इच्छा रहती है, ये बनारस कि गंगा है कलकत्ते कि गंगा से अलग है...!!

अगर आप कभी जाये बनारस और कहीं गंगा मिले तो कहियेगा हम रोज नहाते है गंगा में क्यूंकि हम तो दिल में ले आये थे गंगा को....!!!

और बनारस हम फिर आयेंगे अच्छे से वहीँ का हो जाने के लिए....!!!

कोशिश कि है लिखने कि मित्रो हो सकता है गलतिया हो बहुत क्योंकि साहित्य से थोडा दूर ही रहे हम क्या करे विज्ञानं वालो कि  भी अपनी  मज़बूरी है.... चलिए अब चाय पिने का वक़्त हो रहा है.


2 comments:

Unknown said...

Achhi kosis hai babua.

Renu said...

kehte hain ki jo maza BANARAS me hai..wo na paris me hai na faaras me..bahut acha likha hai aapne..mantramugdh kar diya..:)